Home Kabir ke Shabd अमर बेलि बिनु मूल की Kabir ke bhajan 10

अमर बेलि बिनु मूल की Kabir ke bhajan 10

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अमर बेलि बिनु मूल की

अमर बेलि बिनु मूल की, प्रतिपालत है ताहि।

रहिमन ऐसे प्रभुहिं तजि, खोजत फिरिए काहि।। 10 1।

अर्थ—रहीम कहते हैं–बिना जड़ की अमर बेल का पालन-पोषण करते हुए ईश्वर को त्यागकर मनुष्य संसार में व्यर्थ ही इधर-उधर शांति की खोज किस कारण से करता है?
भाव—ईश्वर बड़ा सदय है। इस धरती पर जड़-चेतन, वह सभी का ख्याल रखता है। जिसने भी जन्म लिया है, उसके पालन की व्यवस्था वह परमात्मा स्वतः ही कर देता है। जिस प्रकार अमर बेल (इसे आकाश बेल भी कहते हैं, यह पीले रंग की होती है) बिना जड़ के ही वृक्षों और झाड़ियों पर फैलती रहती है। उसका पालन जिस प्रकार होता है, उसी प्रकार निर्बल और असहाय व्यक्तियों की देखभाल भी ईश्वर करता है। यह मनुष्य व्यर्थ में शांति की खोज में भटकता है, जबकि परमात्मा तो उसके भीतर बैठा हुआ है। वह हर पल उसका ख्याल रखता है, अतः हमें सदैव उसे स्मरण करते रहना चाहिए।..

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