एक उदर दो चोंच हैं
एक उदर दो चोंच हैं, पंछी एक कुरंड।
कहि रहीम कैसे जिए, जुदे जुदे दो पिंड।। 19 ॥।
अथ –साकुरंड (पीली कटसरैया) पौधे पर बैठे पक्षी का पेट तो एक ही है, किंतु उसकी चोंच दो हैं , रहीम कवि कहते हैं कि दोनों चोंचों के अलग-अलग रहने पर उसका पेट नहीं भर सकता । इसका एक अर्थ यह भी है कि कैंची के दो फलक हैं। दोनों एक मध्य जोड़ (पेट) से जुड़े हैं। रहीम कवि कहते हैं कि शान चढ़ाने वाला पत्थर दोनों फलक पर ही शान चढ़ाता है, तभी वे दोनों फलक मिलकर कार्य करते हैं।
भाव—इस दोहे का भाव यही है कि प्रयास किए बिना जीव अपना पेट नहीं भर सकता। परमात्मा ने सभी जीवों को पेट दिया है, किंतु कर्म किए बिना अर्थात जब तक वह जीव प्रयास नहीं करेगा, भोजन मुख में डालने के उपरांत उसे चबाएगा नहीं, तब तक उसका पेट नहीं भर सकता। खुले मुख से कोई पदार्थ उदरस्थ नहीं किया जा सकता है।