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मनुष्य का मित्र कौन?

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मनुष्य का मित्र कौन? 

धर्मराज युधिष्टिर जब स्वर्ग लोक पहुँचे तो यक्ष ने उनसे पूछा – मृत्यु के समय सब पृथ्वी पर ही छूट जाता है। सगे , संबंधी, मित्र कोई भी साथ नहीं दे पाता। तब उसका मित्र कौन है जो उसका साथ देता है।
युधिष्ठिर ने कहा – मृत्यु प्राप्त करने वाले व्यक्ति का मित्र दान है, वही उसका साथ दे पाता है। यक्ष ने अगला प्रश्न पूछा-श्रेष्ठ दान क्या है? युधिष्ठिर ने कहा – जो श्रेष्ठ मित्र की भूमिका निभा सके। फिर प्रश्न था–” दानं परं किचं?” उसका उत्तर था, “’सुपात्र दत्तम” जो सत्पात्र या सुपात्र को दिया जाये। जो प्राप्त दान को श्रेष्ठ कार्यों में लगा सके, उसी सत्पात्र को दिया गया दान श्रेष्ठ होता है। वही पुण्य फल प्रदान करने में समर्थ होता है।
दान को धर्म में एक जरूरी और श्रेष्ठ कार्य बताया गया है। अथर्ववेद में कहा है – ”शतहस्त समाहार सहस्त्र हस्त किरं।” अर्थात्‌ सैंकड़ों हाथों से कमाओ और हजारों हाथों में बाँट दो। ऐसा भी कहा गया है कि जो सम्पन्न व्यक्ति अपनी सम्पत्ति का भोग बिना दान के करता है, वह श्रेष्ठ व्यक्तियों की श्रेणी में नहीं माना जा सकता।
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कबीर ने कहा था कि अर्थ की शुद्धि के लिए दान आवश्यक है। जिस प्रकार बहता हुआ पानी शुद्ध रहता है, उसी तरह धन भी गतिशील रहने से शुद्ध रहता है। धन कमाना और उसे शुभ कार्यों में लगाना, अर्थ शुद्धि के लिए आवश्यक है। धन का केवल संग्रह ही होता रहे तो संभव है, एक दिन उसी नाव की तरह मनुष्य को डुबो देगा, जिसमें पानी भर जाता है।
दान धन को गतिशील, सामर्थ्यवान बनाता है, जिस पानी की टंकी से पानी निकाला ही न जाए तो उसमें आने वाले पानी का श्रोत भी ठंडा पड़ जायेगा। जब पानी वितरित होता रहता है, तभी टंकी में जल आने की गुंजाइश रहती है। स्वामी रामतीर्थ ने कहा था  दान देना ही आमदनी का एकमात्र द्वार है। जहां दिया नहीं जाता, खर्च नहीं किया जाता वहां धीरे धीरे आमदनी की संभावना भी कम हो जाती है।
दान व्यवहारिक जीवन में एक ऐसी साधना पद्धति है कि उसके माध्यम से हम अपने आप में अनेक आध्यात्मिक मानसिक, चारिक्रिक-गुण, विशेषताओं का अर्जन कर सकते हैं। विक्टर हागो ने कहा था ज्यों ज्यों धन की थैली दान में खाली होती जाती है, त्यों त्यों दिल भरता जाता है। दान से मिलने वाला संतोष और प्रसन्नता का महत्व कम नहीं है।
स्वामी विवेकानन्द जब अमेरिका में थे तो एक दिन जब वे अपना भोजन बनाकर खाने की तैयारी में थे तो बच्चों की एक टोली हसते हँसते वहाँ आ पहुची स्वामीजी से रहा नहीं गया और उन्होंने बच्चों को पास बैठाकर बड़े प्यार से सारा भोजन खिला दिया। एक दूसरे सज्जन जो यह सब देख रहे थे, बोले – स्वामीजी! आप तो अब भूखे ही रह जाओगे। स्वामी जी ने कहा – इनको भोजन करा कर जो तृप्ति हुई है और जो संतोष मिला है, वह उस भोजन से नहीं मिल सकता था।
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