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भजन राग देश १३३
हमारा ।
निशदिन भया रहा मझारा।
बंगला खूब बना है निरगुण
मूरख नारायण जप ले। टेक
इस बंगल में दस दरवाजे पवन लगे दो खम्बा ।
आवत जात कोई नहीं देखा ये ही बड़ा अचम्भा
चार तत्त्व की भीति उठी है पाँच तत्त्व की गंगा।
राम-२ की छपरा छाया चीन्हे न चीन्हनहारा ।
दास कबीर चरखा चलता आठ पहर हकतारा।
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