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राग बिलाप-२७
अब मैं भूली गुरु तोहार बतिया,
डगर बताब मोहि दीजै न हो। टेक
मानुष तन का पाय के रे नर,
क्यों
तन छूटे मन घोड़ा होइहैं,
मुख
मन घोड़ा तन पालकी,
होइहै नैन सब अग।
हसा चलिहै या नगरी से,
ज्ञान
न भजे हरिनाम ।
प परिहै
आगि लगे बैकुण्ठ में ही,
घमसाना।
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भूले चले संग।
कहैं कबीर सुनो भाई साधो,
लगाम ।
जर जर गिरे सिंगान ।
जियरा और करेंगे सिंगार। 
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