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गजल चेतावनी (राग देश) ३५
सतनाम सुमिर प्यारे अब वक्त जा रहा है।
मानुष शरीफ पाके मुक्त क्यों गंवा रहा है टेक
सुर दुर्लभ तन पायके तनिक ये करत विचार
फिर अवसर अनमोल यह मिले न दूजी बार ।
जिसको तू कौड़ियों के भाव से लुटा रहा है।
एक स्वांस जो जाता है, फिर वह आवत नाहिं।
सोया तू निश्शंक हो कौन भरोसे माहिं।
शिर पर तेरे यमराज नगारा बजा रहा है।
सतनाम
सतनाम सुमर प्यारे अब वक्त जा रहा
प्रीति करन परिवार सब, निज स्वारथ के हेतु।
सतनाम सुमर प्यार
कोउ· साथ नहिं देत।
मुसीबत उठा रहा है।
वक्त जा रहा है
बहुविधि करी अपराध निज, क्यों विरामात ।
नकवास में होता तिनका कौन हवाल।
अन्त समय परलोक में
जिनके लिए दिन रात
दुश्मन भी जिन्हें देखके आंसू बहा रहा है।
सतनाम सुमर प्यारे अब वक्त जा रहा है।
संगीत करि जाऊं साधु की उर मेल
कहैं कबीर भटकत फिरे, ज्यों तेली को बैल
मेरी कही तो बात हवा में उड़ा रहा है।
सतनाम सुमर प्यारे अब वक्त जा रहा है।
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