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कबीर भजन १६५

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कबीर भजन १६५ 
बस धुन को कुद खबर नहीं,
जो सदा यहा बजाता है।
मन मन्दिर धुन खूब बजे,
बाहर हुआ तो क्या हुआ।
योगी जुगत जाने नहीं,
कपड़ा रंगे गेनुआ वाना।
वाकिफ नहीं जिससे,
मन्तर लिये से क्या हुआ।
शतरज चोपट गजमा,
यह गर्द है बदरंग की।
बाजी न लगाई प्रेम की,
खेला जुआ तो क्या हुआ।
काशी अयोध्या द्वारिका,
सारे जहां घूमता फिरा
रमना ने नाम लिया नहीं,
तीरथ किए से क्या हुआ।
गांजा अफीकी और शराबी,
चाटते चखता फिरा। 
एक नाम रस चाखा नहीं,
असली हुए से क्या हुआ !
काजी किताबां खोल के,
करना नसीहत देश की। 
समझा नहीं मजहब भला,
काजी हुए से क्या हुआ।
सब शास्त्र को संग्रह किया,
कुल श्रेष्ठ पंडित बन गया।
जाना नहीं सिरजन हार का,
पंडित हुए से क्या हुआ।
कहत कबीर सोच के नर,
सोचन ही से बने ।
साहब तो तेरे पास है,
घर घर ढूंढ़े से क्या हुआ।
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