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स्वारथ का घर बार

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जब तक पैसे पास हैं, तब तक संग हजार।
पैसा निकयो गांठ से झट देते हैं मार॥
सहारनपुर में एक साहूकार रहता था। उसके छ: पत्र ‘ थे। जब साहूकार की आयु 90 वर्ष की हो गई, तो उसके बेटों ने उसका सारा धन आपस में बांट लिया। वे सब अपने पिता से बोले–पिताश्री! आप मकान की ड्यौढी में बैठे रहा करें और रसोई घर में जाकर भोजन कर लिया करें। किसी गैर आदमी को मकान के अन्दर मत आने देना। 
वृद्ध पिता ने अपने पुत्रों की बात मान ली और ड्यौढ़ी में आसन डाल लिया। कुछ समय व्यतीत होने पर लड़कों की पत्नियों ने अपने पतियों से कहा- इनके ड्यौढ़ी में बैठे रहने से हमको बाहर आने जाने में बड़ी दिक्कत होती है। इतना ही नहीं इन्होंने थूक-थूककर सारा रास्ता खराब कर रखा है तथा रसोई घर में जब खाना खाने आते हैं तो वहाँ भी थूकते रहते हैं। इसलिए इनके रहने का प्रबन्ध मकान के ऊपर बनी बरसाती में कर दें । वहाँ पर पखाना और बाथरूम भी पास ही हैं। उन्हें वहाँ थूकने का भी आराम रहेगा। सब भाइयों ने मिलकर अपने पिता के हाथ पाँव पकड़कर ऊपर छत पर ले गये और बरसाती में डाल दिया। उन्होंने अपने पिता को मंदिर में बजाने वाली घंटी देकर कहा–पिता श्री! जब आपको किसी वस्तु की आवश्यकता हो तो इस घंटी को बजा दिया करना। घंटी की आवाज सुनकर हमारे में से कोई भी आ जाया करेगा और तुम्हारी जरूरत की वस्तु दे जायेगा।
इस प्रकार जब वृद्ध पिता को जिस च्रीज की आवश्यकता होती वह घंटी बजा देता और उस वह वस्तु मिल जाती। पिता के साथ पुत्रों का यह व्यवहार देखकर’ बड़े लड़के का बेटा जिसका नाम गम्भीर चन्द था, उस पर बहुत बुरा प्रभाव पड़ा । एक दिन गम्भीर चन्द ने गम्भीरता से सोचते हुए अपने पिता एवं पांचों चाचाओं, माता और चाचियों को उनकी मूर्खता का पाठ पढ़ाने के लिए एक उपाय सोचा। 
वह ऊपर बरसाती में जाकर अपने दादाजी की घंटी को चुपके से उठा लाया और उसे एक सन्दूक में रख दिया। जब वृद्ध पिता को भूख लगी तो उसने घंटी उठानी चाही परन्तु खोजने पर भी उसे घंटी नहीं मिली। वृद्ध ने एक दो आवाज भी लगाई मुझे बहुत भूख लगी है, खाना भेज दो। परन्तु उसकी धीमी आवाज नीचे तक नहीं पहुँच सकी। 
इधर वृद्ध का पानी भी समाप्त हो गया था। भूख प्यास से उसके प्राण घबरा रहे थे। शाम के छ: बज गये फन घरवालों ने आज प्रातः से ही भोजन व पानी नहीं भजा धर और न कोई उनकी सुध-बुध लेने उनके पास गया। रात्रि क आठ बजे वद्ध के छहों बेटे अपने वद्ध पिता के पास ऊफ गये तो देखा कि पिता श्री तो जमीन पर पड़े हुए जीवन की अंतिम सांस गिन रहे हैं। 
बड़े बेटे ने पिता के पास बैठकर उनसे पूछा आपकी 
तबियत कैसी है? खाना खाया या नहीं। पिता ने हाथ के इशारे से कह दिया कि भोजन नहीं खाया। छोटे बेटे ने 
अपनी बड़ी भावज को बुलाकर पूछा कि आज पिताश्री को भोजन पानी दिया था या नहीं, वह बोली–खाना पानी ऊपर कैसे भेजती जब आज सुबह से अभी तक घंटी की आवाज नहीं सुनाई दी। उसकी बात सुनकर उसके पति ने अपने पिता से पूछा कि आपने आज सुबह से घंटी क्‍यों नहीं बजायी। व॒द्ध पिता ने इशारे से बताया आज न जाने घंटी कहाँ गुम हो गई है।
बड़े बेटे ने घर के सब सदस्यों को बुलाकर पूछा कि इनकी घंटी कहाँ गई । सबने इन्कार में सिर हिला दिया। तब गम्भीर चन्द ने कहा कि पिताश्री दादाजी की घंटी तो आज सवेरे में उठा कर ले गया था और उसे मैंने अपने सन्दूक में रख दी है। बड़े बटे ने गम्भीर चन्द से पूछा तूने यहाँ से घंटी क्‍यों उठाई और सन्दूक में क्या रख दी? 
गम्भीर चन्द बोला–सुनिए पिताश्री! मैंने घंटी उठाकर इस कारण से सन्दूक में रख दी कि जब आपकी अवस्था दादाजी के बराबर हो जायेगी तब तुमको भी इसी बरसाती में डाल कर यही घंटी तुम्हारे हाथ में दे दूंगा और कहूँगा कि आपको जिस वस्तु की आवश्यकता हो घंटी बजा दिया करें। इधर तो पिता-पुत्र की इस प्रकार वार्ता चल रही थी और उधर बूढ़ा बाप अपने मन में बार-बार सोच रहा था कि ‘तेरी सारी आयु व्यर्थ गई। जिन पुत्रों को बड़े कष्ट उठाकर पाला पोषा था, वे सब तो सारा धन लेकर अलग हो गये और अब कोई पानी को भी नहीं पूछता। बस यही सोचतेसोचते उस व॒द्ध के प्राण पखेरू उड़ गये। 
बेटे गम्भीर चन्द की इस यथार्थ भावना को सुनकर और पिताश्री की भूख प्यास के कारण मृत्यु देखकर समस्त घरवालों का सिर शर्म के मारे नीचे को झुक गया।  
प्रिय भाइयों! मनुष्य का कर्त्तव्य है कि जब उसकी संतान गहस्थ चलाने योग्य हो जाये तब उनको गृहस्थ का भार सौंपकर स्वयं जीवन की शेष आयु भगवान के चिंतन में लगाते हुए विरक्त हो जाये और भविष्य में बेटे आदि की सहायता न लेनी पड़े ऐसा प्रबन्ध पहले से ही स्वयं कर लेना चाहिए, जिससे कि उनको किसी के मुख की ओर ताकना न पड़े। 
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