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सन्त की कृपा

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सन्त की कृपा 

सन्त हृदय’ नवजीत समाना। 
. एक बार की बात है कि एक सन्त एक नदी में स्नान कर रहे थे। उसी समय एक बिच्छू पानी में बहता चला जा रहा था। उसे देखकर सन्त को दर्या)आ गई और उसे निकालना चाहा। 
फलस्वरूप सन्त ने तरकर उस बिच्छू को जैसे ही पकड़ा वैसे ही उसने ऐसा डंक मारा कि सन्त को पीड़ा के कारण अपने हाथ को उल्टा करना पड़ा और बिच्छू पानी मं गिर गया । उसने _ पुन: बिच्छू को निकालना चाहा तो पहले की तरह उन्हें विच्छु . के डंक की पीड़ा हाथ में सहने के कारण बिच्छु फिर पाना में गिया गया । इस प्रकार बार बार उसके डंक की चोट का सन्त _ सहन कर रहा था। क्‍ 
यह देखकर एक सज्जन ने कहा–महात्मन्‌! यह बिच्छू ‘ है। अपनी आदत कभी नहीं छोड़ेगा। इसलिए इसे छोड़कर आप स्नान कीजिये। 
सन्त बोला-भक्त! आपका कहना सोलह आने सत्य है, परन्तु जिस प्रकार यह बिच्छू अपनी आदत छोड़ने में लाचार है, उसी प्रकार दूसरों का उपकार करने वाले भा अपना आदत को छोड़ने के लिए मैं भी तैयार नहीं हू। अत: चाहे यह मेरे हाथ में कितने ही डंक क्‍यों न मारे परन्तु में इसे अवश्य ही बाहर निकाल कर इसके प्राणों की रक्षा करूगा और थोड़ी ही देर में बिच्छू को नदी से बाहर निकाल लिया। 
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