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सगठन मे ही शक्तिहै!

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“’सगठन मे ही शक्तिहै!

 एक किसान ने अपने अंतिम समय में अपने सातों बेटों । | को बुलाया। उसने प्रत्येक बेटे से लकड़ी के गट्ठर को तोड़ने | ) को कहा। प्रत्येक बेटे ने उसे तोड़ने का प्रयत्न किया परन्तु । ) कोई भी सफल न हो सका। ( ( इस पर लकड़ी के गदठ्ठर को खोलकर एक-एक लकड़ी सबके हाथ में थमाकर उसे तोड़ने को कहा। सब बेटों ने ( अपनी-अपनी लकड़ी को तोड़ डाला। इस पर किसान ने अपने बेटों को समझाया कि लकड़ी ) के गटठर की तरह तुम भी इसी प्रकार मिलकर रहोगे तो ‘ तुम्हें कोई भी हानि नहीं पहुँचा सकता परन्तु मिलकर न रहे तो लकड़ियों की तरह तुम्हें कोई भी हानि पहुँचा सकता है। 

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