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मुझे कुछ नही चाहिए

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मुझे कुछ नही चाहिए 
पुराने समय में एक सन्‍यासी महात्मा इतने पवित्र थे व्कि देवता विस्मित होकर स्ोच्चने त्नगे व्कि “हमें ऐसी अवस्था कब प्राप्त होगी? ‘ ‘ ठेवताओं ने ईश्वर के पास जाकर कहा –प्रश्न! इस महात्मा को कोई वरदान देना चाहिए। ईश्वर ने कहा—ठीक है, उससे पूछो किछि वह क्‍या चाहता है? 
देवताओं ने महात्माजी के पास जाकर पूछा –क्‍या तुम्त ऐसी सिदिद्धि चाहते हो कि तुम्हारे स्पर्श मात्र से रोगी ठीक हो जायें? सहात्माजी ने कहा—नहीं, यह काम त्तो ईशएवर का है, इसे उन्हें ही करने दो।॥ देखता बोले—तो क्मयथा आप ऐसी सिद्द्धि चाहते हो व्छि जिससे पापियों का उद्धधाार हो जाये और कुमार्ग पर चलने वाले ल्लोग सन्‍्मार्ग पर चलने लगें। साधु ने कहा—नहीं, में यदि लोगों को अपनी ओर आकर्षित करने लगूगा तो लोग ईश्वर से विमुरत्र होकर दुःस््ी रहने लगेंगे। 
देवताओं ने अत में पूछा—_-तो तुम क्‍या चाहते हो? साधु महाराज बोले—-सुझे क्या चाहना है? ईश्वर की कृपा सुझ पर बनी रहे, बस में तो यही चाहता हूँ । देवता बोले—-हमारा आपके पास आना निष्फल न हो, इसल्लिए आपको कुछ तो मांगना ही पड़ेगा? नहीं तो हम जबरदस्ती आपको वरदान दे देंगे। तब साधु महात्मा ने कहा—अगर ऐसी जात है, तो में इतना ही चाहता हूँ कि सुझे पता भी न चले और मेरे हाथों से अनेकीं सत्कर्म होते रहें । देवताओं ने प्रसन्न मन से तथास्तु कहा। 
उन्होंने उन साधु सहात्मा की छाया में ऐसी विशेषता पैदा कर दी व्कि जिससे उसके जाने बिना दूसरों के दुःरब दूर हो जायें । अब वह महात्मा जहाँ जाते, उनकी छाया से सूखे मुझे कुछ नही चाहिए 
पुराने समय में एक सन्‍यासी महात्मा इतने पवित्र थे व्कि देवता विस्मित होकर स्ोच्चने त्नगे व्कि “हमें ऐसी अवस्था कब प्राप्त होगी? ‘ ‘ ठेवताओं ने ईश्वर के पास जाकर कहा –प्रश्न! इस महात्मा को कोई वरदान देना चाहिए। ईश्वर ने कहा—ठीक है, उससे पूछो किछि वह क्‍या चाहता है? 
देवताओं ने महात्माजी के पास जाकर पूछा –क्‍या तुम्त ऐसी सिदिद्धि चाहते हो कि तुम्हारे स्पर्श मात्र से रोगी ठीक हो जायें? सहात्माजी ने कहा—नहीं, यह काम त्तो ईशएवर का है, इसे उन्हें ही करने दो।॥ देखता बोले—तो क्मयथा आप ऐसी सिद्द्धि चाहते हो व्छि जिससे पापियों का उद्धधाार हो जाये और कुमार्ग पर चलने वाले ल्लोग सन्‍्मार्ग पर चलने लगें। साधु ने कहा—नहीं, में यदि लोगों को अपनी ओर आकर्षित करने लगूगा तो लोग ईश्वर से विमुरत्र होकर दुःस््ी रहने लगेंगे। 
देवताओं ने अत में पूछा—_-तो तुम क्‍या चाहते हो? साधु महाराज बोले—-सुझे क्या चाहना है? ईश्वर की कृपा सुझ पर बनी रहे, बस में तो यही चाहता हूँ । देवता बोले—-हमारा आपके पास आना निष्फल न हो, इसल्लिए आपको कुछ तो मांगना ही पड़ेगा? नहीं तो हम जबरदस्ती आपको वरदान दे देंगे। तब साधु महात्मा ने कहा—अगर ऐसी जात है, तो में इतना ही चाहता हूँ कि सुझे पता भी न चले और मेरे हाथों से अनेकीं सत्कर्म होते रहें । देवताओं ने प्रसन्न मन से तथास्तु कहा। 
उन्होंने उन साधु सहात्मा की छाया में ऐसी विशेषता पैदा कर दी व्कि जिससे उसके जाने बिना दूसरों के दुःरब दूर हो जायें । अब वह महात्मा जहाँ जाते, उनकी छाया से सूखे 
वुक्ष हरे हो जाते और ठुःखी मनुष्य सुखी हो जाते। धीरे-धीरे. जब लोगों को उनकी विशेषता का ज्ञान हुआ तो दु:खी और ॥ बीमए व्यक्ति उनके पीछे-पीछे फिरने लगे। 
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