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भले की भलाई बुरे की बुराई !

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भले की भलाई बुरे की बुराई!

एक बार की बात है एक दुष्ट व्यक्ति ने एक सज्नन व्यक्ति से कहा – मित्र! जब तक मनुष्य विदेश में नहीं घूमता तब तक उसकी बुद्धि का विकास सम्भव नहीं है। इसलिए हमें विदेश में चलना चाहिए। सैर भी हो जायेगी और कुछ कमाई भी हो जायेगी। 
सज्जन व्यक्ति उसकी बातों में आ गया और अन्न जल का उचित प्रबन्ध करके दोनों विदेश को चल दिये।
जिस समय वे मार्ग में जा रहे थे तो उस दुष्ट व्यक्ति ने कहा – भाई! तुम एक दुबले पतले इंसान हो, अतः तुम्हारे अन्न जल को खा पीकर तुम्हारे बोझ को कम कर लिया जाये। 
इस प्रकार से उस दुष्ट ने उसको जाल में फँसा कर उसी का अन्न जल खाना पीना शुरू कर दिया। जब सजन व्यक्ति का खाने पीने का सामान समाप्त हो गया तो उसने कहा-मित्र! अब भूख का समय हो चुका है और प्यास भी जोर की लगी हुई है । इसलिए आओ एक वृक्ष की छाया में कुछ रखा पीले। 
उसकी  ये बातें सुनकर दुष्ट व्यक्ति बोला – वाह! तुम भी कैसे आदमी हो? पहिले तो अपना सारा पीने का सामान समाप्त कर दिया। अब मेरे सामान को समाप्त करना चाहते हो । ऐसा कभी नहीं होगा। यदि मैं अपने खाने पीने के सामान में से तुमको दे दूँ तो मैं कैसे जीवित रहूगा? इसलिए माफ़ करना, में अपने समान में से कुछ नहीं दूंगा।
उस दुष्ट व्यक्ति की बात सुनकर सज्जन व्यक्ति को बड़ा दुःख पहुँचा और सोचने लगा कि यह मेरा तो सारा खाने पीने का सामान खा गया। अब यह मुझे एक समय के लिए भी खाने की सामग्री देना नहीं चाहता। अब केवल पछताने से क्या लाभ हे? सज्जन पुरुष को जब प्यास सताने लगी तो उसने दुष्ट व्यक्ति से कहा – मित्र ! मुझे बहुत जोर की प्यास त्लर रही है। कृपया मुझे थोड़ा स्री जल पिला कर मेरे जीवन व्की रक्षा करने की कृपा करें। । 
दुष्ट व्यक्ति बोला—.ऐसा सम्भ्भव नहीं है! में तुम्हें एक बूंद भी जलन कोी पीने को नहीं दे सकता ॥ तुम स्वयं जलन का प्रबन्ध करो । 
सज्जन व्यक्ति ने पूछा—-क्या आप किसी भी शर्त पर मुझे जल पिलाकरर मेरे प्राणों की रक्षा कर सकते हैं? 
दुछट व्यक्ति ने उत्तर दिया—यदि तुम प्रसन्नता पूर्वक अपना एक नेत्र फुड़वाना स्वीकार कररो तो में तुम्हें जल पिला सकता ह्ू्‌। 
सज्जन व्यक्षित ने सोचा कि मरने से तो काना हो जाना अच्छा है। यह सोचकर उसने कहा—मित्र ! आप जैसा ठीव्क समझो वैसा करो, परन्तु मुझे जल पिलाकरर मेरे प्राणों की रक्षा करो। 
तदुपरान्त उस धूर्त ने सज्जन व्यक्ति की आँख फोड़कर । उसे जल पिलाना शुरू कर दिया। अभी उसने मुश्किल से दो दि 
चार घूँट ही पानी पिया था कि दुष्ट व्यक्ति ने पानी पिलाना बंद ‘ कर दिया। इस पर सज्जन पुरुष ने कहा–हे मित्र! अब तो हि आपने मेरा एक नेत्र भी फोड़ दिया फिर क्या कारण है कि तुम ह ) मुझे भरपेट पानी नहीं पिला रहे हो। पानी न मिलने से मेरे प्राण ) परेरू उड़ सकते हैं। ह | दुष्ट व्यक्ति बोला–हे मित्र! यदि तुम्हें भर पेट पानी पीना ह् ल्‍ है तो तुम्हें अपनी दूसरी आँख भी फुड़वानी पड़ेगी। )_आत्मानं सततं रक्षेत्‌। अन्त में उस सज्जन व्यक्ति ने अपनी ध् ) दूसरी आँख भी फुड़वा ली। अब उस दुष्ट ने उसे जल तो क्‍या 1 ल्‍ पिलाना था, अपितु उसके पास जो कुछ था, उसे भी हड़प कर ) लिया और उसे एक पुराने कुंए में धकेल दिया और स्वयं वहाँ (६ ) से भाग गया। | ल्‍ सौभाग्य से कुँए में जल था और नीचे वक्ष की जड़ फैली ८ ) हुई थी। इस कारण से उसे अधिक चोट नहीं आयी और वह | ) पेट भर जल पीकर वक्ष की जड़ के सहारे बैठ गया। | ‘ रात्रि होने पर उसे मनुष्य की बोली में कुछ पक्षी बोलते । हुए सुनाई दिये। उन पक्षियों में से एक बोला–कोई बात | ! सुनाइये। दूसरा बोला–क्या बतायें? आज एक दुष्ट व्यक्ति ने । एक सजनन व्यक्ति को इस कुँए में डाल दिया है। वह बेचारा , ॥ अपना सब कुछ खोकर आँखों से अंधा अपने भाग्य को कोस * रहा है। | उसकी बात सुनकर पहले वाला पक्षी बोला–हे मित्र! » क्‍या तुम उसका कष्ट दूर नहीं कर सकते? उसने कहा-क्यों , * नहीं, यह इस वृक्ष पर चढ़कर इसके पत्तों के रस को अपनी ; आँखों में डाल ले तो इसकी आँखों का दर्द तुरन्त समाप्त हो. जायेगा तथा पहले की भाँति इसकी आँखें ठीक हो जायेंगी। इस वक्ष की छाल और पत्तों में एक विशेष गुण यह है कि २. न कम. न कश्यप कम्ट २ ढाल फैक्ट का कट. पतकानम रस. कम काम.भयंकर से भयंकर कोढ़ की सारी व्याधियां केवल इनको जल में उबाल कर स्नान करने से तीन दिन में दूर हो जाती हैं। 
इसके कुए के पास ही एक टीला है, जिसम॑ असंख्य धन गढ़ा हुआ है, परन्तु एक बात यह भी ध्यान रखने को है कि इस वृक्ष का रखवाला एक भयंकर बन्दर है और उस टीले का रखवाला एक सिंह है। इसलिए इस सतपुरुष को सूर्य उदय होने से पहले यहाँ से प्रस्थान कर जाना चाहिए। इतना कहकर वे दोनों पक्षी उड़ गये। अब उस अन्धे सतूपुरुष ने उस वृक्ष पर चढ़कर उसके पत्तों का रस निकालकर अपनी आखों में डाल लिया। 
आँखों में पत्तों का रस डालते ही उसकी आंखों में रोशनी आ गई और आँखों का दर्द भी दूर हो गया। उसने खुश होकर उस वृक्ष की बहुत सी छाल और पत्तों को तोड़कर उनकी एक पोटली बना ली तथा शाप्रता से वहां से चल पड़ा। 
सूर्योदय होने पर वह एक नगर में पहुचा | वहां का राजा भयंकर कोढ़ की बीमारी से ग्रस्थ था। उसने अपने राज्य में घोषणा करवा रखी थी कि जो व्यक्ति उसे स्वस्थ कर देगा उसके साथ वह राजकुमारी का विवाह करने के साथ साथ आधा राज्य भी प्रदान करेगा। यह घोषणा उस सतपुरुष ने भी सुनी। 
वह सीधा राजदरबार में पहुँचा और राजा से बोला-महाराज! में आपकी बीमारी को तीन दिन में समाप्त कर सकता हूँ। आपके शरीर को कंचन के समान बना दूँगा। 
राजा बोला–यदि तुम ऐसा करने में सफल रहे तो में तुम्हें खुशी-खुशी अपना दामाद बना लूँगा और साथ में अपने आधे राज्य का स्वामी भी बनाऊँगा। | 
राजा की बात सुनकर उसने अपने साथ लाये वृक्ष की छाल और पत्तों को पानी में उबालकर उस जल से राजा को तीन दिन तक स्नान कराया। राजा बिल्कुल ठीक हो गया। 
राजा ने उसके साथ राजकमारी का विवाह कर दिया और आधे राज्य का स्वाप्ती बना दिया। अब वह राज्य का सुख भोगता हुआ आनन्द पूर्वक अपना शेष जीवन व्यतीत करन लगा। इतना ही नहीं बल्कि राजा उससे सलाह लेकर ही सब काम करने लगा। 
इस घटना को घटित हुए अभी कुछ ही दिन हुए थे कि दैवयोग से वह दुष्ट व्यक्ति अपना सब कुछ जुए में हार गया और भूख-प्यास से पीड़ित होता हुआ उसी नगर में पहुचा। इधर वह सतपुरुष हाथी पर बैठकर बाजार से जा रहा था। ‘ 
अचानक दोनों व्यक्तियों ने एक दूसरे को देखा तो वे एक दूसरे को पहचान गये। उस दुष्ट व्यक्ति ने अपने मन में सोचा कि यह आज मुझसे उस दिन का बदला अवश्य लेगा, . परन्तु उस सतपुरुष ने ऐसा नहीं किया। बल्कि अपने नौकरों की सहायता से उसने उसे अपने साथ हाथी पर बैठा लिया। ‘ वह प्रेम और श्रद्धा के साथ उसे अपने महल में ले गया महल में पहुँचकर उसने अपनी पत्ती और नौकर नौकरानियों को , बताया कि यह मेरा मित्र है। इसकी आव-भगत में कोई कमी न रहने पाये। क्‍ 
सतूपुरुष की आज्ञानुसार उस दुष्ट की बड़ी सेवा सुश्रुषा की जाने लगी। जिस वक्त उसके सम्मुख विविध प्रकार के व्यंजनों से सज्जित स्वर्ण थाल उसके सम्मुख रखे गये तो वह दुष्ट व्यक्ति कुछ उदास होकर अपनी आँखों में आँसू भर लाया। इस पर सेवकों ने पूछा-श्रीमान जी! आप उदास क्‍यों हैं? क्‍या भोजन आपको पसन्द नहीं आया या आपकी सेवा में , कोई कमी रह गई है। कृपया अपनी उदासी का कारण हमें ‘ बताने का कष्ट करें। यदि राजा साहब को इस बात का पता चल गया तो वे हम पर नाराज होंगे। 
दुष्ट बोला–आप जो कुछ कह रहे हैं, उनमें से कुछ नहीं है। मेरी चिन्ता का कारण और ही है। यदि आप जानना ही चाहते हैं तो आपको मैं बता सकता हू, परन्तु एक शर्त है कि यह बात आप किसी को नहीं कहेंगे। 
सेवक बोले–श्रीमान जी! हम सौगन्ध उठाकर कहते हैं. कि आपकी बात हम किसी को नहीं बतायेंगे। उसने बताया-तुम्हारा यह राजा जो मुझे अपना मित्र बता रहा है, यह हमारे गाँव का रहने वाला एक हरिजन ( भंगी ) है। एक दिन यह किसी साहूकार के यहाँ फोड़े फुन्सी का इलाज करने हेतु गया तो इसने वहाँ चोरी कर ली। पुलिस जब इसे पकड़ने गई तो यह भाग गया। सौभाग्यवश यह यहाँ राज कन्या से विवाह कर आधे राज्य का स्वामी बन गया। शास्त्रों के अनुसार हरिजन के घर का अन्न खाना उचित नहीं है। इस कारण से चिंतित हो रहा हूँ कि इस अन्न को खाता हूँ, तब तो दोष का भागी बनता हूँ और यदि नहीं खाता हूँ तो इसकी मान हानि होती है। मेरे उदास होने का यही कारण है। 
उस दुष्ट की बात सुनकर सेवकों को बड़ा दुःख पहुँचा। धीरे-धीरे यह समाचार उस सज्जन पुरुष की रानी तक पहुँच गया। जब यह समाचार राजकुमारी ने सुना तो वह उसी समय आसन पाटी लेकर महलों में गिरकर जोर-जोर से रोने लगी। जब उसकी माता ने यह समाचार सुना हो उसने अपना सेवक भेजकर राजा को महल में बुलवा लिया । महल में आने पर जब राजा ने यह समाचार सुना तो वह इतना क्रोधित हो गया कि उसने अपने मंत्री से कहा –शी प्र ही उस हरिजन को शूली पर चढ़ा दिया जाये क्योंकि उसने अपनी जाति छिपाकर राज कन्या से विवाह करके हमारे धर्म पर कुठाराघात किया है। 
राजा की आज्ञा सुनते ही मंत्री ने उस सत॒पुरुष को दरबार में ही हथकड़ी बेड़ी पहना दी और उसे चार जल्लादों को सौंपकर शूली पर चढ़ाने की आज्ञा प्रदान की । जिस समय वह सतपुरुष शूली पर चढ़ाया जाने लगा तो उससे उसकी अंतिम इच्छा पूछी गई कि क्‍या तुम किसी से मिलना चाहते हो या तुम्हारी इच्छा रिउसी वस्तु को प्राप्त करने की है। सतपुरुष ने उत्तर दिया –मैं अपने अंतिम समय में केवल महाराज से मिलना चाहता हूँ। केवल मेरी यही अंतिम इच्छा है। यद्यपि राजा उससे बिल्कुल मिलना नहीं चाहते थे परन्तु फिर भी उन्होंने मृत्युदण्ड के अपराधी की इच्छा पूरी करना आवश्यक समझा। राजा उसके पास जाकर कहने लगे कि ओरे नीच! पापी! बता कया चाहता है, क्योंकि अधिक देर तक तुम्हारे दर्शन करना पाप समझता हूँ। राजा की बात सुनकर उस सतपुरुष ने नप्नता पूर्वक कहा–महाराज! आपसे मेरे बारे में झूठी बातें कही गयी हैं। इस समय आप क्रोध में हैं परन्तु जब आपको सत्य, असत्य का बोध होगा, उस समय आपको पछताना पड़ेगा और आपको महान कष्ट पहुँचेगा। फिर भी आपसे मेरी एक विनती है कि उस पर आप अवश्य ध्यान दें । चूँकि आपकी कन्या का विवाह मेरे साथ हुआ है इसलिए शास्त्रों के अनुसार वह मेरी पत्नी है और वह जब तक जीवित रहेगी मेरी पत्नी के नाम से ही पुकारी जायेगी । इसलिए उसके भरण-पोषण का प्रबन्ध करना मेरा कंर्त्तव्य है। अत: महाराज से मेरा निवेदन है कि जब तक मैं जंगल में दबे हुए अपने खजाने से अपना द्रव्य न निकलवा लूँ तब तक के लिए मेरे वध की आज्ञा को स्थगित किया जाये तथा खजाने को खोदकर निकालने हेतु कुछ सेवकों का भी प्रबन्ध करने की कृपा करें। यह सुनकर राजा ने यह आज्ञा दी कि इसे जितने सेवक चाहिये दे दिये जायें और जब तक वह खजाने से भली प्रकार द्रव्य को निकलवाये, तब तक इसे पहले की तरह सम्मान दिया जाये। इसके बाद जैसा उचित समझा जायेगा वैसी आज्ञा प्रदान की जायेगी। इसके बाद वह सतपुरुष बहुत से सिपाहियों को नाना तरह के शस्त्रों के साथ वहाँ ले गया, जहाँ वह अन्धा बनाकर पुराने कुए में फेंका गया था | वहां पहुचचकर उसने पक्षियों द्वारा बताये गये टीले को रव़ुद॒याया । सुदाई करने पर उसमें से असंरव्य द्रव्य निकले जिसमें सोने चादी के साथ स्लाथ अमूल्य रत्नों के अनेक लोहे के सन्‍्दूव्छ भरे पड़े थे । जब यह रखजाना हाथी, घोड़े, ऊट और छकऊड़ों में भरकर राजा के सम्मुस्ब किया गया तो उसे देखकर राजा अति प्रसन्न हुआ | इतना ही नहीं, उसने आज्ञा दी कि वास्तव में इसके त्तिए ज्जो प्रचार व्छिया गया था, लह सच नहीं है। यह हरिजन नहीं अपितु किसी देश का राजा है । अभी भी इसके पास मेरे से भी अधिक धवन है | इस्नत्लिए आज से समस्त राज्य का यही सर्वेसर्वा होगा और जिससत प्रव्कार मेरी इज्जत व्की जाती है उसी प्रकार इसकी आज्ञा में चत्लकर इसका सान सम्मान किया जाये। राजा अपने राज्य का भार उस सतपुरुष को सौंपकर ‘ अपनी रानी के साथ चन में ईशएवर व्का भजन व्औररने हेतु चला ‘ | गया।॥ वह सतपुरुष अब समस्त राज्य का स्वामी बनकर आनन्द ‘ पूर्वक जीवन व्यतीत वक्करने त्वगा। कुछ दिन लाद उस्रका वही दुष्ट मित्र पुन: उसी शहर में ‘ | आया। उस्र समय उसकी दशा अत्यन्त सोचनीय थी। वह ; , केलत्न एक ल्ंगोटी पहनकर, भयंकर कोछ से पीड़ित होकर , | एक एक टुकड़े व्फे ल्लिए गली-गल्लीी में चक्कर त्लगा रहा था। ‘ ल्‍ जब उस सत्‌पुरूष ने उस दुष्ट मित्र को देखा तो वह रोने ‘ | लगा और उदास होकर वब्लोत्ता—हे मित्र ! तुम्हारी यह दशा कैसे , | हुई? उसने लताया-भाई ! यह सब मेरे दुष्कर्मो का परिणाम ‘ | है। यद्यपि मैंने आपके साथ ऐसी खुराई व्की है जो सुझे नहीं । ) वकररनी चाहिये थीं परन्तु तुम ध्यन्य हो न्सयोंकि तुमने मेरी बुराई , 4 व्छा खट॒त्ना भ्वलताई से दिया है । अब पीछे व्ली ओर ध्यान न देकर ४ ) मेरी दुछ्टता को क्षमा करने को कृपा करते हुए सुझे इस भयंकर ) रोग से सुक्त कररें। ( ५ यह जात सुनकर सत्पुरुष ने कहा—हे मित्रवर! तुम मेरे शत्रु नहीं अपितु पूर्ण हितैषी हो क्योंकि यदि तुम मेरी आखें न फोड़ते और यहा आकर मुझे हरिजन न बतलाते तो किस प्रकार में राज कन्या से विवाह करता और किस प्रकार इस राज्य का स्वामी बनता? इसलिए आपने जो मुझ पर कृपा की है, उसको में कभी नहीं भूल सकता। अब तुम्हें मेरे साथ महल में चलना पड़ेगा। 
जहां पर तुमने मुझे अन्धा बनाकर एक कुए में डाला था। उस कुए पर कुछ वृक्ष हैं। उसके पत्ते और छाल तोड़ लेना और उन्हें पानी में उबालकर उस पानी से तीन दिन तक स्नान कर लेना । इससे तुम्हारी काया कंचन के समान हो जायेगी। इतना ही नहीं तुम उस वृक्ष के पत्ते और छाल अपने पास ही रख लेना | उन्हीं के द्वारा ऐसे भयंकर रोगों को खोकर धन और यश कमाना। | 
सतपुरुष का यह उपदेश सुनकर वह दुष्ट जैसे ही उस स्थान पर पहुचा त्योंही सिंह और बन्दर ने उसे अपराधी जानकर उसके टुकड़े टुकड़े कर डाले।
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