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दोहावली

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अन्तर दाव लगी रहे, धुआं न प्रगटे सोइ। के जिय आपन जानही, कै जिहि “बीती होइ।। 41। 

अर्थ–मन में अग्नि धधकती रहती है, परंतु उसका धुआं बाहर प्रकट नहीं होता। जिस व्यक्ति के मन पर जो घटित हो रहा होता है उसका अंतर ही उसको जान सकंता है, अन्य कोई नहीं। 
भाव—इस दोहे का भाव यही है कि प्रत्येक व्यक्ति का अपने जीवन में अपना ही दुख-सुख होता है। किसी की क्या पीड़ा है, वह तब तक नहीं जानी जा सकती, जब तक वह स्वयं ही अपने मुख से न कहे। 
अतः बिना सोचे-समझे कभी किसी को पीड़ा नहीं पहुंचानी चाहिए। जीवन में न जाने कितने-कितने लोगों के साथ हमारा मिलना-जुलता होता है और उनके मन की बात को जाने बिना ही हम उन्हें या तो सलाह देने लगते हैं या उनके किसी कार्य अथवा बात को देख-सुनकर उस पर टिप्पणी करने लगते हैं या उसकी आलोचना करने लगते हैं। यह प्रवृत्ति सरासर गलत है। 
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