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दोहावली

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तैं’ रहीम मन आपुनो, कीन्हों चारु चकोर। निति बासर लागो रहे, कृष्णचंद्र की ओर।।1॥। अर्थ–कवि रहीम कहते हैं कि जिस भक्त ने अपना हृदय चकोर पक्षी की भांति बना लिया है, वह रात-दिन कृष्ण रूपी चंद्रमा की ओर ही देखता रहता है। भाव–भक्ति के लिए समर्पण भाव का होना परम आवश्यक है। समर्पण भाव से ही एक भक्त अपने दृष्ट से एकाकार हो पाता है और उसके रूप माधुर्य का रसास्वादन कर पाता है। इस पद में रहीम कवि ने कृष्णभक्त की मनोदशा का बड़ा सजीव वर्णन किया है। यहां भक्त की तुलना चकोर पश्नी से की है, जो चंद्रमा के रूप माधुर्य से मोहित होकर निरंतर उसी को निहारता रहता है। उसी की भांति कृष्णभक्त, कृष्ण की स्मृति में ही रात-दिन लगा रहता है। 
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