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“छाया का पीछा छोड़ो”!

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“छाया का पीछा छोड़ो”! 

घुटने के बल चलने वाले एक बालक ने किसी दिन अपनी परछायी देखी। यह परछाई उसे अद्भुत वस्तु जान पड़ी क्योंकि वह हिलता तो उसकी छाया भी हिंलने लगती थी। वह बालक छाया का माथा पकड़ने का प्रयास करने लगा। वह माथा पकड़ने का जितना प्रयास करता था उतनी ही छाया दूर होती जाती थी। इस प्रकार बच्चा काफी देर तक छाया को पकड़ने का प्रयास करता रहा, परन्तु छाया उसके हाथ नहीं आयी।”बालानां रोदनं बलम्‌” इस कहावत के अनुसार बालक ने रोना प्रारम्भ कर दिया। चलते-चलते वह थक कर गिर गया तो छाया भी गिर गयी। 
बालक की माता उसका यह कौतुक देख रही थी। वह दौड़कर आयी और उसने बालक का हाथ उसके मस्तक पर रख दिया। इससे बालक जिस मस्तक को पकड़ने के लिए इतनी देर से व्यग्र था, वह सहज में ही पकड़ में आ गया । यह देखकर बालक अति प्रसन्न हुआ और हँसने खेलने लगा। इसी प्रकार अज्ञानी व्यक्ति बालकों की भाँति छाया को पकड़ने कला प्रयास करने लगते हैं लेकिन हाथ कुछ नहीं आता तथा वे रोते और दुःखी होते हैं।.. ., 
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