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कबीर भजन १६२

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कबीर भजन १६२

भज मन जीवन नाम सवेरा। टेक
सुन्दर देह देख लिन भूखी,
झपट लेत जस वाज़ बटेरा।
या नगरी में रहन न पेहों,
रनि जाए यहां दुख घनेरा।
कहै कबीर सुनो भाई साधो,
मनुष जनम न पैहों पेरा।
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