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कबीर भजन १६०

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कबीर भजन १६०
भजन कर बीती जात घड़ी। टेक
भुइं में गिरे हवा जब लागी,
माया अमल परी।
पिता घोर मुस्कान मन ही मन किल कठिनकरी।
खेलत खात गलिन में झूमे चर्चा और विसरी।
ज्वान का भिति संग भात अब कहूं कहां सरी,
दक्षिण दिशा छियासी योजन यमराजा नपरी।
ता मग चलत काटे बाडू लागे सुनने बात खरी,
सौ योजना आगे बेतरनी पार उतरि जब जेहि।
चित्रगुप्त जब लेखा मांगे फिर वहां कहा करी
साह बड़े जहाज के कारण गुरु उपदेश करी
कहै कबीर सुनो भाई साधो सतगुरु पार करी
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