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कबीर भजन पील १११

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कबीर भजन पील १११
बिन सतगुरु नर फिरत भुलाना,
खोजत फिरत न मिले ठिकाना। टेक
केहरि सुत एक लामल डरिया,
पाल पोस तेहि किये सयाना।
करत किलोल करत अजयन संग,
अपना मर्म नहीं बन जानु ।
भृगपति और जंगल आवे,
ताहि देख बहुत डराना ।
पक हो भेद ताने समुझाओ,
अपनी दशा देख मुस्काना।
जैसे मृगा नाभि कस्तूरी,
खोजत मूढ़ फिर चौगाना।
व्याकुल होय मृग ही मन सोचे,
यह सुगन्ध कह कहां गुसाना।
गुरु प्रताप निज रूप दिखायो,
सो आनन्द नहीं जात बखाना।
कहे कबीर सुनो भाई साधो,
उलटि के आप में आप बखाना।
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