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अपने को सर्वसमर्थ समझना भूल है

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अपने को सर्वसमर्थ समझना भूल है

सच्चाई छिप नहीं सकती बनावट के उसूलों से। खुशबू आ नहीं सकती कभी कागज के फूलों से ॥ एक समय की बात है कि एक चतुर कारीगर ने अपनी चतुराई से ऐसी मूर्ति का निर्माण किया कि देखने वाले कोई यह पहचान नहीं कर सकते थे कि कौन मूर्ति असल है कौन-सी नकल है। उसने सोचा कि जब मनुष्य ही असल नकल का भेद नहीं कर पा रहे तो यमदूतों को क्‍यों न ठगा जाये। उसने अपने ही समान दस-बारह पुतलों का निर्माण किया, जब यमदूत उसे लेने आये तो वह उन पुतलों में से एंक में छिप गया। यमदूत धोखा खाकर लौट गये और अपने सरदार यम से युक्ति सीखकर लौट आए। यमदूत जब लौट कर आये तो वह उन्हीं पुतलों में से एक में छिपा बैठा था। 
यमदूतों ने उसका बखान करना शुरू कर दिया। 
वे बोले–वाह! यह कितना बड़ा कारीगर है। ब्रह्मा जी ‘ भी इसके पास पानी भरेंगे। अब तक हमने ऐसा कारीगर नहीं देखा परन्तु इन पुतलों में एक जरा सी कमी रह गयी है। , अपनी प्रशंसा व कमी सुनकर पुतले से बाहर निकल आया ‘ और कहने लगा–बताओ, कहां भूल हो गयी है? इसमें क्या कमी रह गई है। यमदूत बोले–तुम्हारी इस बुद्धि में जरा सी कमी रह गई है जो तुम पुतले से बाहर निकल आये। इतना कहकर यमदूतों ने उसे पकड़ लिया और घसीटते हुए _ यमपुरी ले गये। कहने का तात्पर्य यह है कि अपने को _ सर्वसमर्थ समझना ही भूल है। कहीं न कहीं कभी न कभी _ चूक हो सकती है। | 
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