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सुकुमार वीर-Sukumar Veer

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सुकुमार वीर
महाभारत के युद्ध का नवम दिन था । आज भीष्मपितामह पूरी उत्तेज़ना में थे । उनका धनुष आज प्रलय की बर्षा कर रहा था । पाण्डव दल में क्षण क्षण पर रथ, अश्व, गज और योधा कट-कटकर गिर रहे थे । हाहाकार मच गया था पाण्डव दल मेँ । बड़े-बड़े विख्यात महारथी भी भाग रहे थे । व्यूह छिन्न-भिन्न हो चुका था । सैनिकों को भागने को स्थान नहीं मिल रहा था । श्रीकृष्ण चन्द्र ने यह अवस्था देखकर अर्जुन को उत्साहित किया । पितामह पर बाण-वर्षा करने की इच्छा अर्जुन में नहीं थी किंतु अपने परम सखा श्रीकृष्ण की प्रेरणा से वे युद्ध के लिये उद्यत हुए । वासु देव ने उनका रथ पितामह के सम्मुख पहुँचाया । पाण्डव-सेना ने देखा कि अर्जुन अब पितामह से युद्ध करेंगे तो उसे कुछ आश्वासन मिला ।
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अपने सम्मुख अर्जुन के नन्दिघोष रथ को देखकर भीष्म का उत्साह और द्विगुणित हो उठा। उनके धनुष की 
प्रत्यझा का घोष बढ़ गया और बढ़ गयी उनकी बाणवृष्टि ! अर्जुन ने दो बार उनका धनुष काट दिया किंतु इससे पितामह का उत्साह शिथिल नहीं हुआ । उनके पैने बाण कवच फोड़कर अर्जुन और श्रीकृष्ण के शरीर को विद्ध करते जा रहे थे। दोनों के शरीरो पे रक्त के झरने बह रहे थे।
श्रीकृष्णचन्द्र ने देखा कि उनका सखा अर्जुन मन लगाकर युद्ध नहीं कर रहा है । उन जनार्दन को अपने जनों में प्रमाद सह्य नहीं हैँ । आज अर्जुन पितामह के प्रति पूज्य भाव होने के कारण युद्ध भूमि में क्षत्रिय के उपयुक्त कर्तव्य के प्रति जागरूकता का परिचय नहीं दे रहे थे । वे शिथिल हो रहे थे कर्तव्य के प्रति ! मधुसूदन यह सह नहीं सके। उन्होंने घोडों की रषिम छोड दी और चाबुक ही लिये दौड पड़े भीष्म की और।
रक्त और लोथों से पटी युद्धभूमि, स्थान-स्थान पर पड़े बाण, खड्रग, खपिडत धनुष और उसमें दौड़ते जा रहे थे कमललोचन वासुदेव ! उनके चरण रक्त से सन गये थे उनके शरीर से रक्त प्रवाहित हो रहा था । उनके नेत्र अरुण हो उठे थे। उनके अधर फड़क रहे थे । उनके उठे हाथ में चाबुक की रस्सी घूम रही थी । दौडे जा रहे थे वे भीष्म की और युद्ध के प्रारम्भ मेँ ही दुर्योधन ने आचार्य द्रोण तथा अपने सभी महारथियो को आदेश दिया था – ( भीष्म मेवाभिरक्षन्तु भबन्त: सर्व एव हि’ ) आप सब लोग केबल भीष्म की सावधानी से रक्षा करे। 
वहाँ द्रोणाचार्य थे, अश्वत्थामा थे, शल्य थे, दु:शासन के साथ दुर्योधन था अपने सभी भाइयों के सङ्ग और उसके पक्ष के सभी महारथी थे किंतु सब हाथ उठाकर स्त्रियों की भाँति चिल्ला रहे थे-भीष्म मारे गये। भीष्म अब मारे गये। 
श्री कृष्ण – सौ कुमार्य की मूर्ति श्री कृष्ण और उनके पास कोई शस्त्र नहीं। वे चक्र नहीँ, केवल चाबुक लेकर दौड़ रहे थे । परंतु जिसका संकल्प कोटि-कोटि ब्रह्मामाँडों को पल में ध्वस्त कर देता हैँ, उसके हाथ मे चक्र हो या चाबुक, कौरव-पक्ष मे ऐसा मूर्ख कोई नहीं था जो आशा करे कि रोष में भरे मधुसूदन के सम्मुख वह आधे पल रुक सकेगा। कराल काल भी जहाँ काँप उठे, वहाँ मरने कौन कूदे । धरी रही राजाज्ञा, भूल गया शौर्य, पूरा कौरव दल हाथ उठाये पुकार रहा था- भीष्म मारे गये! अब मारे गये भीष्म !

भीष्म तो अपने रथ मेँ बैठे स्तुति कर रहे थै – पधारो मधुसूदन ! अपने हाथों मारकर भीष्म को आज कृतार्थ कर दो माधव ! परंतु अर्जुन कूद पड़े अपने रथ से। दौड़कर पीछे से उन्होंने अपने सखा के चरण पकड़ लिये और कहा…मुझे क्षमा करो वासुदेवा में अब प्रमाद नहीं करूँगा । तुम अपनी प्रतिज्ञा मत तोड़ो।
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