Home Hindu Fastivals श्री श्याम दातार: आशीर्वाद, लीला और भक्ति का स्रोत

श्री श्याम दातार: आशीर्वाद, लीला और भक्ति का स्रोत

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Hare ka shara

हारे का सहारा बाबा श्याम हमारा कथा “श्री श्याम दातार” 

श्रीश्याम धणी की जय बोलो जय श्री श्याम बाबा जय श्रीश्याम

दोहा
गजानन्द का ध्यान धर गौरीपति मनाय। 
श्यामधणी का यह चरित्र लिखा है ध्यान लगाय।
दोहा 
कलियुग के हैं देव प्रथम जो देते हैं फल चार।
 बोल इसीलिये कलि में उन्हें भजते हैं नर नार॥ 
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बोल
क्या वर्णन करूँ महिमा इनकी ये देव बड़ा ही निराला है।
जो शरण में इनकी आ पहुंचा उसे सर्व सुखी कर डाला है॥ जो दामन इनका थाम लेवे उसके कष्ट सभी कट जाते हैं। संकट में अगर पड़ जायें भक्त तो ये आकर उसे छूड़ाते हैं।॥ ये कथा बहुत पुरानी है द्वाप का अन्तिम पसारा था।
उस मायापति की माया में कलियुग का शुरु नजारा था। महाभारत के युद्ध की एक गाथा तुम्हें सुनानी है।
इन श्यामधणी के महादान की यह एक छुपी निशानी है॥
सब समय समय का चक्कर है बिन समय न कुछ हो पाता है।
जब समय पलट जाता है नर का तब क्‍या से क्या हो जाता है।
थे कौरव पाण्डव भाई भाई पर भाई चारा रहा नहीं।
आपस की खेंचा तानी में कुछ कुल में बाकी रहा नहीं।
थे धर्म युधिष्ठिर उस कुल में पर धर्म धर्म से पला नहीं पापी दुर्योधन के आगे कुछ चारा उनका चला नहीं॥
संकल्प था दुर्योधन का जीते जी इन्हें मिटा दूंगा मिट जाये चाहे संसार सभी पर नामोनिशान मिटा दूंगा।
एक रोग छली दुर्योधन ने एक सुन्दर खेल रचा डाला।
उस खेल खेल में पापी ने विष भीम बली को दे डाला॥ मूर्छित हो गया जब भीमबली दरिया में उठाकर डाल दिया। मानो दुर्योधन ने ऐसे जीवन का कांटा निकाल दिया॥
ऐसी हालत में भीम जिस समय नागलोक में जा पहुंचा हे। वासुकी नाग की -कन्या का मानो सुहाग आ पहुंचा है।॥ वासुकी नाग को एक समय मां पार्वती ने वचन दिया।
होवे कन्‍्या वही अहलवती थी जो मां की भी वरदानी थी। शिव की पूजा नित करती थी सतवन्ती थी गुण खानी थी॥ शिव के पूजन में एक रोज ये ताजी फूल न चढ़ा सको।
माता पार्ववी भी अपने कुछ मन के भाव न छुपा सकौ॥
मां पार्ववी ने क्रोधित हो उस कन्या को शाप दिया।
मुझाये पुष्प चढ़ाकर के पति का मेरे अपमान किया। ये शाप तुझे मैं देती हूं, इस करनी का फल पायेगी।
मूर्छित फूलों के बदले में मूर्छित सुहाग ही पायेगी।
अहलवती बोली माता सब जप तप नष्ट हो जायेगा गर उजड़ गया ज्ञो सुहाग मेरा तो जन्म भ्रष्ट हो जायेगा॥
अपराध हुआ चितिसे माता वरदान दूसरा दे डालो॥
सुख से भर झोली या जीवन मेरा ले डालो।
बल बुद्धि में होगा अपार उसे जीत ने कोई पायेगा॥
ये पुरुष वही था भीम जिसे वहां मूर्छापन में पाया है।
वासू की नाग की कन्या में झट अमृत इन्हें पिलाया है॥
फिर नारद मुनि आज्ञा से दोनों का हुआ विवाह बहां।
इसी तरह भीम बली कुछ करते रहे विहार बहां।
जब आई सुधि भ्राताओं की बोले अब चला मैं जाऊंगा।
थे वचन अहलवती देता हूं जब चाहोगी आ जाऊंगा।॥
भीम के यहां आ जाने से खुशी पाण्डव कुल में भारी थी। थह वही समय आ पहुंचा था जब महाभारत की तैयारी थी॥ उधर अहलवती के द्वारा एक सुन्दर पुत्र उत्पन्न हुआ।
मानो था वो भी महाबली जीवन से सुख सम्पन्न हुआ। बर्बवीक नाम रक्खा उसका ओर महा तेज भी पाया है।
यह वही नाम और वही बली जो श्यामधणी कहलाया है। भिड॒पडे कौरव पाण्डव दोनों आपस मे युद्ध घमशान ठना॥ वो पावन धाम कुरूक्षेत्र जो मानो आज शमशान बना।
ये युद्ध महान भयंकर था जो नहीं भुलाने वाला था।
मर मिटे कोरव पाण्डव दोनों कुछ साथ न जाने वाला था। बालक बर्बराक भी माता से ले विदा युद्ध में आया है।
उस महाप्रलय में लड़ने को बस तीन बाण ही लाया है॥ भगवान कृष्ण ने देखा कि बर्बरीक युद्ध में आया है।
डट गया अगर ये युद्ध में तो मानो त्रिलोकी का हुआ सफाया है।
ये पक्ष भी लेगा उस दल का जो हार मानने वाला है।
इसकी ताकत से फिर दल को यहां कौन बचाने वाला है। यही गअसोचकर मायपति मन में अनुमान लगाने लगे।
उस वी बर्बरीक बालक पर माया के फन्दे चलाने लगे॥ भगवान कृष्ण ब्राह्मण बनकर जब सामने उसके आये हें। बालक की अनूठी देख छवि प्र मन ही मन मुस्करये हें॥ भगवान ने पा जब उससे तो हाल सभी बतलाया है। उस युद्ध में में भी भाग लूंगा ये निश्चय मैंने ठहराया है।
उप्त तरफ लड़ूँ मैं निश्चय ही जो पक्ष हारने वाला हो। अरमान करु पूरे उससे जो उन्हें मारने वाला हो।
है आन मुझे इष्ट की मेरे जीते जी न बाजी हारूंगा।
बस इन्हीं तीन वाणों द्वारा त्रिभुवनन को में संहारूगा।
है आशीर्वाद मां का मुझको जीवन बलिदान चढ़ा दूंगा। निर्बल पक्ष की विजय के हेतु त्रिलोकी आज हिला दूंगा। भगवान कृष्ण ने सोचा ये गर ये वीर युद्ध में डट जाये।
तो एक अर्ज़ भीम की तो ताकत क्या मेरा भी चक्र पलट जाये॥
तुम दानी कितने हो देखे ये इच्छा हुई हमारी है।
ये सुनकर बर्बरीक बोले, मंगते की सब इच्छा भर दुं।
जो अगर जरूरत पड जाये तो शीश तार अर्पण कर दूं ।
भगवान ने वो ही मांग लिया और तुरंत शीश दे डाला है ।
ये महिमा महादानी की है जो सर्वस्व भी दे डाला है।
पर उस योद्ध ने मांगा था ये जो मांगोगे दे जाऊंगा।
दे दो एक वचन मुझको कि ये युद्ध देख मैं पांकँगा।
इसीलिए शीश को लेकर के प्रभु ने ऐसा ब्िधान किया। उस कटे शीश को युद्ध स्थल में एक खम्बे पर स्थान दिया। जब महाभारत के युद्ध में मिट गये सभी कौरब लड़कर। मिल गई विजय जब पाण्डवों को करते थे बातें बढचढकर। जब बोले कृष्ण भगवान स्वयं ये युद्ध किसी ने किया नहीं। तब फेसला दिया शीश ने ये जो देखा सो बतलाते थे।
इस कुरूक्षेत्र की भूमि में मायापति ही दरसातें थे॥
भगवान कृष्ण की महिमा से पाण्डव गण का जयकार हुआ। काली खप्पर वाली द्वारा सब दुष्टों का संहार हुआ।
भ्रम दूर हुआ पाण्डव गण का भगवान कृष्ण मुस्कराते हैं। उस कटे शीश की ओर देख मोहन बलिहारी जाते हैं॥
फिर आशीर्वाद दिया प्रभु ने हाथ उठा प्रसन्‍न होकर। कलियुग में पूजे जाओगे तुम कुल देवता होकर।
ये आशीर्वाद हमारा है जो नाम तुम्हारा गायेगा।
बिगड़े कार्य बनेंगे उसके मन वांछित फल पा जायेगा।
ये वही श्याम दातार हैं जिन्होंने शीश वहां दे डाला है।
जो शरण गया है उनकी उसका सब दुख हर डाला है।
जो इनका ध्यान करे कलि में जीवन उसका बन जायेगा।। श्रोताओं अब भी गये तो ये समय हाथ नहीं आयेगा॥ “श्याम” जिन्दगी थोड़ी है और झूठा सभी झमेला है।
इस चला चली की दुनिया में बस चार दिनो का मेला है। सुमिर कर श्याम दातार का मन को लगा ले तू।
उनसे नाता जोड़कर बिगड़ी हुई किस्मत बना ले तू॥
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