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असली आनंद हमारे भीतर है, वह बाहर से हासिल नहीं होगा – The real joy is within us, it will not be achieved from outside

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असली आनंद हमारे भीतर है, वह बाहर से हासिल नहीं होगा

आज का इंसान सुख की चाह में कस्तूरी मृग की तरह दौड़ रहा है। अपने बारे में सोचने का उसके पास समय ही नहीं है। हम जब अपने स्व के साथ रहते हैं तो शांति और परम आनंद का अनुभव करते हैं। यह अपना जो स्व है, वह सुख राशि है, आनंदमय है, परमशांत है। वास्तव में असली आनंद हमारे भीतर ही है। हम स्वयं आनंद स्वरूप हैं। आनंद को अपने से बाहर कहीं से हासिल करने की आवश्यकता नहीं है। यह तो ऐसा हुआ कि शक्कर मिठास को और नमक खारेपन की खोज में निकल पड़े। इसीलिए कहा गया है- ‘मौको कहां ढूंढे रे बंदे, मैं तो तेरे पास हूं।’

जीव ब्रह्म का ही रूप है, आत्मा परमात्मा ही है। लेकिन अपनी अज्ञानता के चलते उसने अपने आपको ईश्वर से अलग मान लिया है। यह अलग मान लेना ही अज्ञान है। जब जीव खुद को ईश्वर से अलग अनुभव करता है तो संसार में घुलामिला वह दुख, उसकी अशांति और पीड़ा का कारण बनता है।

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शास्त्र कहते हैं कि संसार असार है, दुख रूप है। उसका जो रूप है वह मोहित करने वाला है, इसलिए स्वयं की ओर लौट आएं और स्व में स्थित हो जाएं। जो अपने स्व में स्थित हुआ, वही स्वस्थ है। जो अपने स्व से बाहर है, संसार में भटक रहा है, वह रोगी है। इसी से स्वस्थ शब्द बना। निरोगिता यही है कि हम अपने स्व में स्थित रहें। अपने स्वरूप में हमारी स्थिति हो जाए। स्व से दूर ले जाने वाली यात्रा को संसार कहते हैं, इसलिए शास्त्रों ने संसार को भव रोग कहा है। भव रोग को कैंसर और एड्स से भी खतरनाक है। लेकिन जब हम अन्य रोगों से पीड़ित होते हैं तो उसकी चिकित्सा कराते हैं। डॉक्टर के पास जाते हैं। जो दवाई वह देता है, उसका नियम से सेवन करते हैं। इससे भी खतरनाक रोग है भव रोग, लेकिन उसकी कोई चिंता नहीं करता।

कबीर कहते हैं- ‘देखे सो दुखीया बाबा, सुखीया कोई नहीं। जोगी दुखीया जंगम दुखीया, तपसी को दुख दूना। आशा वर्षा सब घट व्यापी, कोई महल नहीं सूना।’ संसार में जिसे भी देखो वह दुखी नजर आता है। किसी के पास संपत्ति है तो संतति नहीं। किसी के पास संतति है तो संपत्ति नहीं, संतति और संपत्ति दोनों हैं तो स्वास्थ्य नहीं। संसार है ही दुख रूप। चाहे संसारी हो, चाहे संन्यासी, सब दुखी हैं। इस भव रोग की दवाई अगर है, तो यह कि अपने स्व में स्थित हो जाएं। यह हमारा जो ‘स्व’ है, यह आनंदमय है। परमात्मा तो हमारे भीतर ही बसे हैं। यदि यह पहचान हो गई तो उसी स्व में स्थित रहेंगे। फिर हमें आनंद और परम शांति पाने से कोई रोक नहीं सकता।

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