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मौन रहना भी स्वास्थ्य वर्द्धक होता है – Staying silent is also healthy.

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मौन रहना भी स्वास्थ्य वर्द्धक होता है।

‘एक चुप, हजार सुख’। जब तक आदमी मुंह बंद रखता है उसकी औकात पता नहीं चलती पर उसके मुंह के खुलते ही उसके स्वभाव, ज्ञान, चरित्र सब की पहचान हो जाती है।
प्रकृति ने मनुष्य को शरीर के साथ-साथ अनेकों सुविधाएं और सामर्थ्य प्रदान किया है। पर बहुसंख्यक को जीवन भर अपनी इस क्षमता की पहचान नहीं हो पाती। उदाहरण स्वरूप मानव मस्तिष्क को लिया जा सकता है जिसका एक तिहाई प्रयोग भी कोई बिरला ही कर पाता है। हमारे सारे अंग-प्रत्यंग अपने-आप में एक अजूबा हैं और हम उनकी सारी उपयोगिताओं से अंजान ही रहते हैं। ऐसी ही एक खूबी है हमारी वाकशक्ति जो प्राय: सभी मनुष्यों में जन्म से ही होती है और समय के साथ ही विकसित होती चली जाती है। इसका उपयोग भी एक कला है। हजारों में से कोई एक ही इसका सही ढंग से उपयोग करना जानता है। पर जो भी अपनी वाणी पर नियंत्रण पा लेता है वह जनसमुह पर अपना प्रभाव डालने में समर्थ हो जाता है। इतिहास में ऐसे अनेकों लोग हुए हैं जिन्होंने अपनी वाणी से समाज की धारा को बदल कर रख दिया है। पर जैसे हर सिक्के के दो पहलू होते हैं वैसे ही इस शक्ति का दूसरा पहलू है “मौन”। जितने भी ओजस्वी वाणी के स्वामी हुए हैं वे सभी इसके प्रभाव और दुष्प्रभाव को जानते थे। वे बोलते थे तो मौन रहने में भी उन्हें महारत हासिल थी। पर मौन साधना भी कोई आसान काम नहीं है। सिर्फ चुप रहने से इसके फल प्राप्त नहीं होते। चुप्पी के साथ-साथ मन और मस्तिष्क को भी संयत करने से मौन की अजश्र ऊर्जा प्राप्त होती है।
मौन यानि चुप्पी। जिसका सीधा अर्थ है अपनी ऊर्जा का संरक्षण। आयुर्वेद में इसका विशद वर्णन है। उसके अनुसार “उदान वायु” बोलने में सहायक होती है और वही शरीर को बल और सामर्थ्य भी प्रदान करती है। इसीलिए ज्यादा बोलने का अर्थ है इसका अधिक क्षरण होता है जिसके फलस्वरूप शरीर में दुर्बलता और कमजोरी घर करने लगती हैं। इसीलिए वाचाल व्यक्ति की अपेक्षा शांत और धीर मनुष्य की आयु लम्बी होती है। यही कारण है कि हमारे ऋषि-मुनि समय-समय पर मौन साधना के लिए समाधि और ध्यान लगाते रहते थे जिससे उन्हें आत्मबल और आत्मिक शांति की भी प्राप्ति होती थी। अपने समय में विनोबा भावे और गांधी जी इसके प्रबल उदाहरण हैं। गांधी जी तो प्रत्येक सोमवार को मौन रखा करते थे। उनके अनुसार यह उनकी प्रकृति नहीं बल्कि आवश्यकता थी। जिससे उन्हें आत्मिक खुराक की प्राप्ति होती थी। इसी मौन की शक्ति से डर, चिंता, घबडाहट तथा कठिन समस्याओं का हल पाया जा सकता है।
एक कहावत भी है कि ‘एक चुप, हजार सुख’। जब तक आदमी मुंह बंद रखता है उसकी औकात पता नहीं चलती पर उसके मुंह के खुलते ही उसके स्वभाव, ज्ञान, चरित्र सब की पहचान हो जाती है। इसका उदाहरण हमें कालीदास से लेकर अपने मनमोहन सिंह तक मिलता रहा है।

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