Home Anmol Kahaniya कर्म से पहचान – निष्काम कर्मों की महिमा

कर्म से पहचान – निष्काम कर्मों की महिमा

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Karma se Phachan

कर्म से पहचान कहानी 

एक राजा किसी जंगल में शिकार खेलने गया। रास्ते में उसे एक सूरदास महात्मा बैठे हुए दिखाई दिये। । राजा ने उनके पास जाकर पूछा -क्यों सूरदास महोदय! इधर से कोई हिरन तो नहीं गया है। सूरदास महात्मा ने कहा – नहीं!
राजा आगे बढ़ गया। थोड़ी देर बाद राजा का मंत्री आया और उसने महात्मा से पूछा – महोदय ! इधर से कौन गया है? सूरदास महात्मा बोले – राजा साहब गये हैं। यह सुनकर मंत्री आगे बढ़ गया। मंत्री के पश्चात्‌ राजा का नौकर आया। उसने भी पूछा – महात्मा! क्‍या तुम्हें पता है कि इधर से कौन गया है?
सूरदास महात्मा ने बताया – अभी राजा और उसके बाद मंत्री गया है। नौकर ने फिर पूछा – आपको यह कैसे पता कि ये राजा और मंत्री थे? सूरदास महात्मा ने बताया – उनकी बोलचाल से। नौकर ने जब यह बात राजा को बताई तो वह बहुत प्रसन्न हुआ और सूरदास महात्मा को अपने यहां बुलवा लिया।
जंगल की कहानी
राजा की ओर से महात्मा के लिए दाल, सब्जी और प्रबन्ध किया गया। दरबार में एक मोती विक्रेता मोती बेचने आया। राजा ने मोतियों को सूरदास महात्मा को दिखलाया। महात्मा ने एक मोती लेकर कहा – यह मोती ठीक नहीं है। इसमें रेत भरी है। ।…
जब उस मोती को तोड़ा गया तो वास्तव में उसमें से रेत निकली। राजा के आश्चर्य का ठिकाना न रहा। राजा ने महात्मा । सूरदास से पूछा – आपको यह कैसे ज्ञात हुआ? महात्मा सूरदास ने बताया – यह दूसरे मोतियों की अपेक्षा भारी था। इस पर राजा ने प्रसन्न होकर उनके भोजन में घी और बढ़ा दिया।
एक बार एक अश्व विक्रेता एक अश्व को बेचने आया। राजा ने उस अश्व को महात्मा सूरदास के आगे खड़ा कर दिया। महात्मा सूरदास ने बताया–इसकी बक्षी चौड़ी है, इसका कारण यह है कि यह अश्व जुड़वा पैदा हुआ होगा।
वास्तव में यह बात सही थी। राजा ने अब महात्मा सूरदास के भोजन में मिठाई और बढ़ा दी। एक दिन राजा ने महात्मा सूरदास से पूछा कि आप मुझे यह बताने का कष्ट करें कि में क्षत्रीय की संतान हूँ या नहीं?
महात्मा सूरदास ने बताया – नहीं, तुम एक वैश्य की संतान हो। राजा ने पूछा – वह कैसे? महात्मा सूरदास ने बताया – यदि तुम क्षत्रीय की संतान होते तो मुझे हजारों लाखों रुपया पुरस्कार में देते। तुम वैश्य की संतान हो, तभी तो कभी दूध, कभी मिट्ठान देने का तुमने व्यापार किया है। यह सुनकर राजा बड़ा खुश हुआ तथा महात्मा सूरदास की बड़ी सेवा होने लगी।
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