Home Others आत्म-परिवर्तन के लिए जरूरी है अनुशासन – Discipline is necessary for self-transformation

आत्म-परिवर्तन के लिए जरूरी है अनुशासन – Discipline is necessary for self-transformation

8 second read
0
0
71
आत्म-परिवर्तन के लिए जरूरी है अनुशासन
उचित एवं शाश्वत परिवर्तन के लिए, व्यक्ति को आत्मानुशासन एवं आत्मप्रशिक्षण की एक क्रमिक विधि का अभ्यास करना चाहिए। मात्र दर्शन एवं बौद्धिक ज्ञान आवश्यकता पडने पर काम नहीं आ सकते हैं, यदि व्यक्ति यह नहीं जानता है कि इस दर्शन के सारभूतों को अपने दैनिक जीवन में कैसे प्रयोग किया जाए। सैद्धान्तिक ज्ञान का प्रयोग करना एवं इसके साथ दैनिक जीवन में रहना ही अभ्यास कहलाता है।

अभ्यास के लिए अनुशासन की आवश्यकता होती है। अनुशासन को कठोरतापूर्वक थोपा नहीं जाना चाहिए, वरन् जिज्ञासु को स्वयं को समर्पित करने एवं अनुशासन को आत्मवृद्धि हेतु एक उपकरण की तरह स्वीकृत करना चाहिए। कठोरता को थोपना एवं इसका अनुकरण किसी भी तरह से सहायक नहीं होता। आत्म-परिवर्तन के मार्ग में आत्मानुशासन उन दोनों के लिए अति आवश्यक है, जो संसार में रहते हैं और जो संसार को त्यागकर मठों में निवास करते हैं। फिर भी जिन्होंने अपने घरों एवं क‌र्त्तव्यों को त्याग दिया है वे पूर्व जन्मों द्वारा रोपित संस्कारों को अपने साथ लिए फिरते हैं। उन संस्कारों से मुक्ति पाने में लम्बा समय लगता है। एक स्वामी या संन्यासी बनना इतना महत्वपूर्ण नहीं है।
discipline

आत्मानुशासित जीवन को स्वीकार करना महत्वपूर्ण है। बाह्य एवं आंतरिक जीवन के मध्य एक सेतु की आवश्यकता है। अनुशासन उस सेतु की नींव है। लोगों को मात्र तकनीकियों (विधियों) से ही प्रलोभित नहीं होना चाहिए, अपितु अनुशासन को स्वयं के भीतर परिष्कृत करना चाहिए।
लोगों ने दूसरों के ऊपर आश्रित रहने की आदत बना ली है। वे सदैव यह चाहते हैं कि दूसरे उनकी सहायता करें और उन्हें यह बताएं कि क्या करना है एवं क्या नहीं। यह एक बुरी आदत है। आप मानव हैं, आपको अपना भार स्वयं उठाना चाहिए। यदि आप एक चिकित्सक, एक उपदेशक या एक अरोग्य करने वाले के ऊपर आवश्यकता से अधिक निर्भर हो जाते हैं तो आपमें एवं एक पशु के मध्य क्या अन्तर रह जाता है? इसका अर्थ यह है कि आप अपने जीवन को अपने प्रशिक्षक द्वारा प्रशासित किए जाने की अनुमति दे रहे हैं। इस तरह की चिकित्सा एवं चिकित्सकों पर निर्भर बनते हुए, आपकी स्व-प्रेरणा एवं स्व-निर्देशन की शक्ति कभी भी अनावृत नहीं हो पाएगी। धर्मग्रन्थ, महात्माओं के अनुभवों के ग्रन्थ, स्पष्ट रूप से कहते हैं कि एक मात्र स्व-सहायता ही सहायता करती है। इस प्रकार की स्व-सहायता के लिए हमें आत्म-प्रशिक्षण की गहन विधि की आवश्यकता है।
समस्त उपचारों एवं प्रशिक्षण की विधियों में सर्वोच्च स्व-प्रशिक्षण (आत्मप्रशिक्षण), जिसमें व्यक्ति अपने विचारों, वाणी एवं कमी के प्रति सचेत रहता है। जब आप स्वयं के साथ कार्य करते हैं तो आप यह पाएंगे कि जब कभी भी आप अपने चेतन मन को शांत करते हैं तो विचारों के बुलबुले अचानक अचेतन मन से उठकर ऊपर आ जाते हैं। मन एवं इसके रूपांतरों को नियंत्रित करना सीखने के लिए यह आवश्यक है कि आत्म-निरीक्षण, आत्म-विश्लेक्षण एवं ध्यान की प्रक्रिया से गुजरा जाए। मन को नियंत्रित करना सीखने एवं चेतन मन तथा अचेतन मन के मध्य संबंधों को सावधानीपूर्वक अध्ययन करने में लंबा समय लग जाता है। कई बार आप सोचते हैं कि आपने अपने विचारों पर विजय प्राप्त कर ली है एवं आपका मन आपके नियंत्रण में है। कुछ दिनों के पश्चात आपके अचेतन मन में कुछ बुलबुले उठते हैं व आपके चेतन मन में हलचल पैदा कर देते हैं जो कि आपकी अभिवृत्ति व व्यवहार को परिवर्तित कर देते हैं।
परिवर्तन की प्रक्रिया में नियमितता एवं सावधानी की आवश्यकता होती है। बिना नियमितता के यह सम्भव नहीं है कि व्यक्ति की आदतों को श्रेष्ठ बनाया जाए अथवा व्यक्तित्व को परिवर्तित किया जाए। धैर्य व्यक्ति को नियमितता बनाए रखने में सहायता करता है जबकि आत्म-विश्लेषण एवं निरीक्षण व्यक्ति को सावधान बनाए रखता है। कभी आप स्वयं को निराश एवं अवसाद ग्रस्त पा सकते हैं किन्तु यदि आप दृढ संकल्पित हैं एवं आत्म-प्रशिक्षण तथा आत्म-परिवर्तन के प्रति समर्पित हैं तो आपको किसी न किसी रूप में निश्चित तौर पर सहायता मिलेगी। सफलता के लिये चिंतित मत होइए, असफलता सफलता का एक हिस्सा है। हालांकि प्रयास न करना गलत है। मुझे जिस आघात, पीडा व निरंतर संघर्ष से गुजरना पडा है, वह मुझे ही ज्ञात है। मैं आपको प्रेमयुक्त सलाह दे रहा हूं और आशा करता हूं कि आप इसका दृढता पूर्वक अनुसरण करेंगे।
अन्त: शक्ति
यदि जीवन में कोई वस्तु अनुकूल नहीं होती तो व्यक्ति को इसे भूलना सीखकर एक नए अध्याय को आरंभ करना चाहिए। शक्ति, शक्ति, शक्ति .. सुखी जीवन को चलाने के लिए इसकी आवश्यकता है और यह शक्ति आन्तरिक शक्ति होनी चाहिए।
अपने अन्तर्मन से दृढ होना सिखाइए। जब आप अन्त:शक्ति पर जीना सीखते हैं तो आप अन्त:शक्ति का उद्भव करते हैं और वह दूसरों की भी मदद करेगी। ईश्वर कहां है? ईश्वर आपके भीतर है, आपके मन एवं संवेगों से परे गहराई में प्रतिष्ठित है। आपको यह ईश्वर केंद्रित प्रार्थना करनी चाहिए:
मैं आपका हूं एवं आपकी रचना मेरी है। मुझे शक्ति चाहिए, कृपया मुझे शक्ति दें। ईश्वर, मैं किसी भी परिस्थिति में हूं, मुझे शक्ति दीजिए। एक दिन आपके पास इतनी अधिक आंतरिक शक्ति होगी कि आप वास्तविकता के अपने अन्त:करण की सत्यता के साक्षी बन जाएंगे और फिर आप सदैव प्रसन्न रहेंगे।
Load More Related Articles
Load More By amitgupta
  • Krna Fakiri Phir Kya Dil Giri – Lyrics In Hindi

    **** करना फकीरी फिर क्या दिलगिरी सदा मगन में रहना जी कोई दिन हाथी न कोई दिन घोडा कोई दिन प…
  • 101 of the Best Classic Hindi Films

    Bollywood This article features 101 classic Bollywood movies that I know we all love. Ther…
  • अमर सूक्तियां-Immortals Quotes

    अमर सूक्तियां संसार के अनेकों महापुरुषों ने अनेक महावचन कहे हैं. कुछ मैं प्रस्तुत कर रहा ह…
Load More In Others

Leave a Reply

Check Also

What is Account Master & How to Create Modify and Delete

What is Account Master & How to Create Modify and Delete Administration > Masters &…