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अमरदास कृत ख्यात ५६
सद्गुरु कबीर अति धीरे-धीरे वीर,
नश्वर शरीर नील अभिमानी।
रोशन जकीर पीरों के पीर,
फयकर फकीर इकलाशनी । टेक
प्रकटे प्रभात पुरइन के पात,
बिन तात मात कर प्रभुताई ।
काशी मझार अवतार था,
लीला अपार वहां दिखलाई।
गुरु रामानन्द आनन्द कन्द,
उनके स्वछन्द दीक्षा पाई।
मन के विकार तजिकर करूं विकार,
कहे बार-बार सबसे आई।
रण्डित प्रवीण हो गए अधीन,
रोशन जमीर पीरों के पीर,
मथुरा में जाय
जगदीश जाय
नहीं बढ़े चन्ह उनकी बानी
धरी सन्त देह
फक्कर फकीर इकजाशनी।
वीणा बजाय,
लीन्हा लुभाय सब नारी नर
सागर हटाय,
दियो स्याह हरि मंदिर
गए समय,
देश कीहों प्रवेश गुरुनाम घर घर।
मेट्यो विरोध द्वंद्व खत
ऐसे वशिष्ठ पूरण ज्ञानी ।
फक्कर ककीर इकलाशनी ।२
तिनके महंत वहि अधिकारी।
मन की तमाम मैंना भारी ।
मेटो विकार सब संसारी ।
दोऊ बिन शेष करके प्रबोध,
गोरख वशिष्ठ से करि गूढ़,
रोशन जमीर पीरों के पीर,
है साधु संग जग में अनन्त,
मद मोह काम दियो द्रोह धाम,
निज शब्द सार करके उबार,
नर हे परम धरम से परे ठाम,
अवगति
• सिधु धार से किये पार,
भव
मुकाम की न्यारी।
करिके उधार कई एक प्रानी।
रोशन जमीर पीरों के पीर,
फक्कर फकीर इकलाशनी। ३
अद्भुत स्वरूप हशन के भूप,
शोभा अनप है अविनाशी ।
भवहरण पीर गुणगण गम्भीर,
तोस्यो जंजीर जग को फांसी ।
सब कलजाल का जला दियो टाल,
तत्काल पार गुरुगम गांसी।
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